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रुझान सूचक

रुझान सूचक
चुनाव प्रचार के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला भाजपा का झंडा।

ठंड सूचक

एक लैगिंग संकेतक एक मापने योग्य या देखने योग्य हैफ़ैक्टर जो किसी व्यवसाय, वित्तीय या आर्थिक चर में परिवर्तन के बाद कुछ समय के लिए बदलता है जिससे यह सहसंबद्ध है। लैगिंग संकेतक, मूल रूप से, परिवर्तनों और प्रवृत्तियों की पुष्टि करते हैं।

Lagging Indicator

ये किसी की प्रवृत्ति का मूल्यांकन करने के लिए काफी उपयोगी हो सकते हैंअर्थव्यवस्था, वित्तीय में संपत्ति बेचने या खरीदने के संकेत के रूप मेंमंडी या एक व्यापार रणनीति और संचालन में उपकरण के रूप में

लैगिंग संकेतकों की व्याख्या

सरल शब्दों में, लैगिंग इंडिकेटर एक वित्तीय संकेत है जो एक बड़े बदलाव के बाद स्पष्ट हो जाता है। इस प्रकार, ये संकेतक दीर्घकालिक रुझानों की पुष्टि करते हैं; हालाँकि, वे उनकी भविष्यवाणी करने के लिए काम नहीं करते हैं।

इसके अलावा, एक लैगिंग संकेतक उपयोगी है क्योंकि कई अन्य प्रमुख संकेतक अधिक अस्थिर हो सकते हैं या उनमें अल्पकालिक उतार-चढ़ाव इतना अस्पष्ट हो सकता है कि वे गलत संकेत दे सकते हैं। इस प्रकार, लैगिंग संकेतकों का आकलन यह पुष्टि करने का एक तरीका है कि अर्थव्यवस्था में बदलाव हुआ है या नहीं।

आर्थिक पिछड़ेपन संकेतक

आर्थिक दृष्टि से, लैगिंग संकेतकों में औसत प्राइम रेट शामिल है जो बैंकों द्वारा लगाया जाता है, औसत रोजगार अवधि, और सेवाओं के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में परिवर्तन। कुछ सामान्य लैगिंग संकेतक उदाहरण कॉर्पोरेट लाभ, बेरोजगारी दर, उत्पादन की प्रति यूनिट श्रम लागत, और बहुत कुछ हैं। अन्य उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) हो सकते हैं,सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी), औरव्यापर का संतुलन.

तकनीकी लैगिंग संकेतक

एक अन्य लैगिंग इंडिकेटर प्रकार तकनीकी संकेतक है जो परिसंपत्ति की वर्तमान कीमत से पिछड़ जाता है, जो कि एक विशिष्ट मूल्य चाल के बाद होता है जो पहले ही हो चुका है। तकनीकी अंतराल संकेतक उदाहरणों में से एक चलती औसत क्रॉसओवर है। अन्य संकेतकों के विपरीत, जो अलग-अलग आर्थिक चर की तुलना करने में उपयोगी होते हैं, एक तकनीकी अंतराल संकेतक किसी दिए गए चर के मूल्य की तुलना एक विशिष्ट अंतराल या किसी ऐतिहासिक विशेषताओं पर चलती औसत से करता है।

बिजनेस लैगिंग संकेतक

व्यवसाय में, लैगिंग संकेतक एक प्रकार के प्रमुख प्रदर्शन संकेतक (KPI) हैं जो व्यवसाय के प्रदर्शन का मूल्यांकन करते हैं, जैसे राजस्व मंथन, ग्राहक संतुष्टि या बिक्री। उन्हें सीधे प्रभावित करना असंभव या मुश्किल हो सकता है।

चूंकि ये व्यवसाय संचालन या निर्णयों के कम से कम आधे परिणाम हैं, ये संकेतक एक व्यवसाय के संचालन के तरीके से प्राप्त परिणामों में अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं। कंपनियां और संगठन प्रमुख संकेतकों पर भी नज़र रख सकते हैं जो आंतरिक प्रदर्शन को मापते हैं, जैसे कर्मचारी संतुष्टि या ग्राहक जुड़ाव जो सीधे प्रभावित हो सकते हैं और परिणामस्वरूप संकेतक में बदलाव हो सकता है।

संपादकीयः नतीजों का संकेत

उपचुनाव के नतीजों को अक्सर आगामी चुनावों में मतदाताओं के रुझान का सूचक माना जाता है। इस लिहाज से देश के आठ राज्यों की बारह विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के परिणाम सियासी दलों के लिए अहम सबक लेकर आए हैं।

संपादकीयः नतीजों का संकेत

चुनाव प्रचार के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला भाजपा का झंडा।

उपचुनाव के नतीजों को अक्सर आगामी चुनावों में मतदाताओं के रुझान का सूचक माना जाता है। इस लिहाज से देश के आठ राज्यों की बारह विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के परिणाम सियासी दलों के लिए अहम सबक लेकर आए हैं। इन चुनावों में सात सीटों पर मिली जीत से भाजपा और उसके सहयोगी दलों में निश्चित ही उत्साह का संचार हुआ है, क्योंकि प्रधानमंत्री के शब्द उधार लें तो यह जीत ‘उत्तरी, पश्चिमी, पूर्वी, दक्षिणी सभी राज्यों में’ पसरी हुई है। इस उत्साह की एक बड़ी वजह यह भी है कि उत्तर प्रदेश, बिहार और कर्नाटक में यह जीत राजग ने तमाम पूर्वानुमानों को झुठलाते हुए समाजवादी पार्टी, जनता दल (एकी)-राष्ट्रीय जनता दल-कांग्रेस से सीटें छीन कर हासिल की है। उधर सत्ताविरोधी रुझान को दरकिनार रुझान सूचक करते हुए मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, तेलंगाना और त्रिपुरा की एक-एक सीट पाकर क्रमश: भाजपा, शिवसेना, अकाली दल, टीआरएस और माकपा अपनी पीठ ठोंकने में लगी हैं। दरअसल, जीत के उत्साह और पराजय की निराशा से परे जाकर इन नतीजों के विश्लेषण की जरूरत है। उत्तर प्रदेश में संवेदनशील मानी जा रही मुजफ्फरनगर सीट से जीत को भाजपा 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव के परिणामों का संकेतक मान कर चल रही है।

यदि वह प्रदेश में सांप्रदायिक माहौल गरमा कर वोट बटोरने की कोशिश में है तो पड़ोस की ऐसी ही संवेदनशील देवबंद सीट पर कांग्रेस की विजय उसके उत्साह पर पानी फेरने के लिए काफी है। मुजफ्फरनगर में 2013 में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद हिंदुत्व के मुद्दे को लेकर भाजपा ने खूब अभियान चलाया था। अगर वह मौजूदा जीत को उस अभियान का प्रतिफल मानने की गलतफहमी में है तो इसी सीट से लगे देवबंद विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस की विजय उसे आईना दिखाने के लिए काफी है क्योंकि देवबंद तो इस्लामी शिक्षण के एक प्रमुख केंद्र के रूप में विश्वविख्यात है। बिहार का उपचुनाव परिणाम सियासी पंडितों के लिए भी चौंकाऊ रहा है, क्योंकि करीब तीन महीने पहले ही विधानसभा चुनाव में शानदार जीत दर्ज करने वाले सत्तारूढ़ महागठबंधन को हरलाखी सीट पर राजग उम्मीदवार से पराजय का स्वाद चखना पड़ा है।

इसके साथ ही पांच राज्यों में सत्तारूढ़ दलों की जीत को उनकी सरकारों के कामकाज पर मतदाताओं की मंजूरी की मुहर मान लेना अति सरलीकरण के साथ ही चुनावी समीकरणों की शुतुरमुर्गी अनदेखी करना है। कौन नहीं जानता कि आज भी तमाम प्रयासों के बावजूद हमारे देश में चुनाव धनबल-बाहुबल से अछूते नहीं हैं। उम्मीदवारों के चयन तक में तकरीबन सभी दल जातीय और सांप्रदायिक गणित को तरजीह देते हैं। चुनाव प्रचार से लेकर मतदान के दिन तक वोटों के ध्रुवीकरण और मतदाताओं को अपने पाले में खींचने के लिए तमाम अवांछित तरीके अपनाने-आजमाने के मामले में कोई राजनीतिक दल खुद के दूध से धुले होने का दावा नहीं कर सकता। ऐसे परिदृश्य में उपचुनाव नतीजों को भविष्य के लिए किन्हीं राजनीतिक दलों के पक्ष या विपक्ष में विश्लेषित कर देना हकीकत से आखें फेर कर निष्कर्ष निकालना ही कहा जाएगा। इन उपचुनावों से झांकता अगर कोई निश्चित संकेत है तो यह कि कुछ राज्यों के आगामी विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दलों के बीच दिलचस्प गठबंधन देखने को मिल सकते हैं। लेकिन इन सियासी गठबंधनों से चुनावों की क्षुद्र राजनीति के कारण एक-दूसरे दल के मतदाताओं के बीच पड़ जाने वाली गांठें भी क्या कभी खुल पाएंगी?

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कमजोर विपक्ष भाजपा का सबसे बड़ा फायदा

जन रुझान (पब्लिक ओपिनियन) बहुत ही गतिशील होता है। लोगों की प्रतिक्रिया कितनी तेजी से बदलती है, जन रुझान उसका सूचक होता है। जो भी आंकड़े निकलकर आते हैं, वे तात्कालिक होते हैं, इसलिए यह नहीं कह सकते कि अगले साल या पांच साल बाद भी ऐसा होगा। मगर इससे एक अंदाजा तो मिलता है कि लोगों का मूड अभी यह है और अगर ऐसा बना रहा तो (चुनाव तक) किस तरह की स्थिति बन सकती है।

हम लोग पिछले डेढ़ साल से कह रहे थे कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सत्ता को दूर-दूर तक कोई खतरा नहीं है लेकिन जिन लोगों ने अंतिम में आकर आकलन शुरू किया, उनके आंकड़े गलत हुए। ममता बनर्जी शुरू से ही आगे थीं और अंत तक आते-आते सिर्फ एक परिवर्तन यह हुआ कि वाम मोर्चा और कांग्रेस के वोट भी बड़ी संख्या में उनकी तरफ स्थानांतरित हो गए। मतदाताओं ने जब देखा कि ममता ही भाजपा को हरा सकती हैं तो उन्होंने पार्टी लाइन से ऊपर उसी तरफ मतदान किया। इसलिए उनकी जो 170-180 सीटों का जो अंदाजा लगाया जा रहा था, उससे 25-30 सीटें और ज्यादा आ गईं।

जन रुझान सर्वेक्षण क्या होते हैं, उन्हें आसानी से एक उदाहरण से समझा जा सकता है। अगर आपको यह देखना है कि हांडी में चावल पक गए हैं या नहीं तो आप चावल का हर दाना उठाकर उसकी जांच नहीं करते, बल्कि एक या दो दाने देखकर ही पता लगा लेते हैं। ठीक उसी तरह हम अलग-अलग जगहों के छोटे-छोटे सैंपल से यह अंदाजा लगा सकते हैं कि रुझान क्या है। नतीजे की सटीकता इस पर निर्भर करती है कि सैंपल संबंधित समाज का या लोगों का उचित प्रतिनिधित्व करता है या नहीं।

नतीजों को समझने में चूक होने की गुंजाइश तब और बढ़ जाती है जब एक साल या पांच साल के लंबे अंतराल पर सर्वे किया जाए। सर्वे से ज्यादा से ज्यादा इस बात का अंदाजा हो सकता है कि एक पार्टी को कितने प्रतिशत स्पष्ट वोट मिल रहे हैं। किस नेता से कितने लोग नाराज हैं, कितने पसंद करते हैं, यह पता चल सकता है। लोग नाराज कितने हैं, किस वजह से नाराज हैं, किससे नाराज हैं और क्या वह नाराजगी इतनी ज्यादा है कि वे सत्ता परिवर्तन करना चाहते हैं।

किसान आंदोलन पंजाब में बहुत बड़ा मुद्दा है। इसमें किसी को भी शंका नहीं होनी चाहिए। पंजाब में चुनाव आ रहे हैं। वहां भाजपा के लिए करने के लिए कुछ भी नहीं है मगर फिर भी विचित्र बात यह है कि हमारे सर्वे बता रहे हैं कि राज्य में भाजपा के 2 फीसदी वोट बढ़ रहे हैं। यह इसलिए क्योंकि पहले भाजपा अकाली दल के साथ मिलकर मात्र 20-30 सीटों पर चुनाव लड़ती थी और इस बार गठबंधन टूट जाने से सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ती है तो उसका राज्य में कुल वोट शेयर बढ़ जाएगा।

भाजपा की ही तरह पंजाब में अकाली दल के लिए भी कोई सहानुभूति नहीं है लेकिन लोकप्रिय नेता के सर्वे में सुखबीर बादल दूसरे स्थान पर हैं। इसकी वजह यह है कि सर्वे में कांग्रेस और आप के दो-दो दावेदारों के नाम रखे गए हैं, जबकि शिअद से सिर्फ सुखबीर बादल का नाम है। ऐसे में कांग्रेस और आप के जन रुझान दो हिस्सों में बंटे हैं अगर उन्हें एक कर दिया जाए तो सुखबीर बादल तीसरे स्थान पर पहुंच जाते हैं। पंजाब में कांग्रेस को नुक्सान भीतरी कलह से हो रहा है। उसके वोट शेयर में 9.7 फीसदी तक की कमी होती दिख रही है। वहां कांग्रेस ने खुद को गड्ढे रुझान सूचक में डाल लिया है।

उत्तर प्रदेश में भाजपा का अब जो भी जनाधार है, वह केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के कारण है। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी यू.पी. के लोगों ने मोदी के चेहरे पर वोट दिया, तब योगी का चेहरा आगे था भी नहीं। 2014 की ही तरह 2019 के लोकसभा चुनाव में भी यू.पी. के लोगों ने मोदी के चेहरे पर ही वोट दिया। योगी की ब्रांडिंग भी उसे कायम रखती है। यू.पी. में भाजपा का वोट 40-41 प्रतिशत है। मुख्यमंत्री की लोकप्रियता भी इतनी ही है। प्रधानमंत्री की लोकप्रियता वहां 45 प्रतिशत है। चाहे इसे यू.पी. में भाजपा का वोट कहें या प्रधानमंत्री की फैन फॉलोइंग, यह एक ही दिशा में है।

कोविड से इतनी मौतें हुईं, उसे लेकर लोगों में गुस्सा है मगर इस गुस्से को अपने वोट में बदलने वाला विपक्ष नहीं है। अगर मुलायम सिंह के हाथ-पांव ठीक से चल रहे होते तो वह पिछले छह महीने में छह सौ बार प्रदेश का दौरा कर चुके होते, मगर उनके उत्तराधिकारी कितनी बार जनता के बीच गए हैं? तीसरे नंबर की पार्टी है बसपा, जिसकी नेता मायावती का चेहरा तो महीनों जनता के बीच दिखाई नहीं देता। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में न तीन में है और न तेरह में। राज्य में नेतृत्व के नाम पर प्रमोद तिवारी केवल अपनी सीट जीतते हैं। प्रियंका गांधी को सिर्फ तीन फीसदी लोग मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। उत्तराखंड में कपड़ों की तरह मुख्यमंत्री बदले गए। इसके बावजूद वहां भाजपा को 44 से 48 सीटें मिलती दिख रही हैं। उत्तराखंड के लोग सरकार से भरे बैठे हैं, थाली सजाकर कांग्रेस को देना चाहते हैं। वहां सबसे लोकप्रिय नेता हरीश रावत हैं, अगर उनके नेतृत्व में कांग्रेस एकजुट होकर उत्तराखंड में चुनाव लड़े तो बहुत कुछ कर सकती है।

अगर ऐसी रुझान सूचक स्थिति में भी उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार नहीं बनती है तो इसके लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार होगी। पांच राज्यों के चुनाव में इस समय भाजपा को जो सबसे बड़ा फायदा दिख रहा है, वह विपक्ष की कमजोरी है। इसके बावजूद भाजपा को यह नहीं भूलना चाहिए कि जनता का जब मन ऊब जाता है तो वह किसी को भी कहीं से उठाकर खड़ा कर देती है। भाजपा का राजनीतिक प्रबंधन बहुत बहुत अच्छा है। कोरोना की दूसरी लहर में जब भाजपा के भीतर ही योगी के प्रति नाराजगी बढ़ी तो हाईकमान ने तत्काल बैठकें कर नाराजगी दूर की। भाजपा जितनी तेजी से डैमेज कंट्रोल करती है, उससे कांग्रेस को भी सीखना होगा। निर्णय करना नेतृत्व का काम है।-यशवंत देशमुख

दिल्ली चुनाव नतीजों से तय होगा राष्ट्रीय रुझान

राष्ट्रीय राजधानी अभी पूर्ण राज्य नहीं है और इसमें केवल 70 विधानसभा सीटें हैं, इसके बावजूद यहां के चुनाव को राष्ट्रीय स्तर पर रुझान तय करने वाला माना जा रहा है।

राष्ट्रीय राजधानी अभी पूर्ण राज्य नहीं है और इसमें केवल 70 विधानसभा सीटें हैं, इसके बावजूद यहां के चुनाव को राष्ट्रीय स . अधिक पढ़ें

  • आईएएनएस
  • Last Updated : December 04, 2013, 03:43 IST

नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी अभी पूर्ण राज्य नहीं है और इसमें केवल 70 विधानसभा सीटें हैं, इसके बावजूद यहां के चुनाव को राष्ट्रीय स्तर पर रुझान तय करने वाला माना जा रहा है। यहां का चनाव पहले भी कई बार लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के रुझान का सूचक बन चुका है।

भारतीय जनता पार्टी पिछले 15 साल से यहां की सत्ता पर काबिज होने की पूरी कोशिश कर रही है। पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में चुनाव प्रचार का नेतृत्व किया और महानगर में पांच रैलियों को संबोधित किया। पार्टी के अनुसार, पिछले 10 दिनों में विभिन्न नेताओं ने 230 जनसभाएं आयोजित की हैं।

लोकसभा चुनाव इस विधानसभा चुनाव के केवल छह महीने बाद ही होने वाला है और बीजेपी के कई नेता दिल्ली से चुनाव लड़ना चाहते हैं। पार्टी इस बार कोई मौका छोड़ना नहीं चाहती, क्योंकि पार्टी ने 1993 के बाद से दिल्ली विधानसभा चुनाव में सफलता का स्वाद नहीं चखा है।

मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस लगातार तीन बार दिल्ली में सरकार बना चुकी है। अब वह चौथी बार जीत की उम्मीद में हैं। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी दिल्ली में रैलियों को संबोधित किया। लेकिन इसके बावजूद 75 साल की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ही दिल्ली में कांग्रेस की प्रमुख प्रचारक के तौर पर उभरीं।

दिल्ली में कांग्रेस के लिए जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सर्वे के अनुसार राजस्थान और मध्य प्रदेश में बीजेपी आगे है और छत्तीसगढ़ में कड़ा मुकाबला है। इसलिए दिल्ली में जीत कांग्रेस के लिए सांत्वना की बात हो सकती है।

इस बार एक रुझान सूचक नया दल आम आदमी पार्टी (आप) ने जमीनी स्तर पर प्रचार कर एक लहर पैदा कर दी है। इसके नेता अरविंद केजरीवाल ने भ्रष्टाचार और आम आदमी के सवालों को उठाकर राजनीति के मुख्य केंद्र में ला दिया है। आप ने दिल्ली के चुनाव को पहली बार त्रिकोणीय बना दिया है।

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