वायदा का उपयोग करके व्यापार कैसे करें

घाटे का सौदा

घाटे का सौदा
बारिश के कारण बर्बाद फसल

वाहन डीलरों के लिए घाटे का सौदा साबित हो सकता है त्योहारी सीजन, जानिए क्या है इसकी वजह

कई मॉडलों घाटे का सौदा की भारी मांग के बीच डीलरों के पास बुकिंग रद्द हो रही है. डीलरों के पास पर्याप्त स्टॉक नहीं होने की वजह से मौके पर खरीद में भी कमी आ रही है

By: एबीपी न्यूज, एजेंसी | Updated at : 10 Oct 2021 11:59 AM (IST)

नयी दिल्ली: वाहन डीलरों के लिए त्योहारी सीजन घाटे का सौदा साबित हो सकता है. ये आशंका जताई है वाहन डीलर संघों के महासंघ (फाडा) अध्यक्ष विन्केश गुलाटी ने. उनका कहना है कि वाहन निर्माता डीलरों को पर्याप्त डिलीवरी सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं. उसकी वजह है निर्माताओं के लिए पैदा हुआ सेमीकंडक्टर का संकट.

नहीं रहा इस बार त्योहारी सीजन डीलरों के लिए मुनाफे का सौदा

गुलाटी ने पीटीआई-भाषा से कहा, ‘‘चिप का संकट जारी है. ऐसे में निर्माताओं को उत्पादन के मुद्दों से जूझना पड़ रहा है. वाहन निर्माता अपने डीलर भागीदारों की डिलीवरी कम कर रहे हैं.घाटे का सौदा ’’ नवरात्रि की शुरुआत से वाहन डीलरों के लिए 42 दिन व्यस्त सत्र माना जाता है. मगर आपूर्ति की कमी के कारण डीलर अपने ग्राहकों को मनपसंद वाहन सुनिश्चित कराने का भरोसा नहीं दिला पा रहे हैं.

कई मॉडलों की भारी मांग के बीच डीलरों के पास बुकिंग रद्द हो रही है. डीलरों के पास पर्याप्त स्टॉक नहीं होने की वजह से मौके पर खरीद में भी कमी आ रही है. गुलाटी ने कहा, ‘‘बिक्री के लिहाज से त्योहारी सत्र हमारे लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है. औसतन इन दो माह में हम अपनी सालाना बिक्री का 40 प्रतिशत लक्ष्य हासिल करते हैं.

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सेमीकंडक्टर संकट के चलते वाहन निर्माताओं ने घटाई डिलीवरी

ये खास समय होता है जबकि हम बाकी महीनों में परिचालन के लिए कमाई और बचत कर पाते हैं. इस साल हमें पर्याप्त संख्या में वाहन नहीं मिल रहे. ऐसे में हमें भारी नुकसान होने का अंदेशा है.’’ उन्होंने कहा कि यात्री वाहन खंड में ज्यादातर मॉडलों के लिए ‘इंतजार की अवधि’ पूर्व के एक से तीन माह की तुलना में काफी अधिक बढ़ चुकी है.

डीलर के पास वाहन नहीं होने से मौके पर बिक्री भी प्रभावित हुई है. गुलाटी ने कहा, ‘‘हमारे आंकड़ों के अनुसार 50 से 60 प्रतिशत खरीदार पूर्व में बुकिंग करा चुके होते हैं. बाकी 40 प्रतिशत शो रूम पहुंचकर ऑन घाटे का सौदा द स्पॉट वाहन खरीदते हैं. लेकिन अभी हमारे लिए ये चैप्टर बंद है.’’

पूरी स्थिति को काफी चुनौतीपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि अगर इन 42 दिन में उद्योग सामान्य बिक्री हासिल कर पाया, तो उसे काफी भाग्यशाली माना जाएगा. उन्होंने बताया, ‘‘हमें बड़े नुकसान का अंदेशा है. त्योहारी सीजन में हमारी खुदरा बिक्री 4 से 4.5 लाख इकाइयां रहती हैं. लेकिन इस बार इसके 3 से 3.5 लाख इकाई रहने का ही अनुमान है. अगर हम ये आंकड़ा हासिल भी कर पाए, तो काफी भाग्यशाली होंगे.’’

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Published at : 10 Oct 2021 11:59 AM (IST) Tags: Festive Season delivery semiconductor crisis vehicles dealers हिंदी समाचार, ब्रेकिंग न्यूज़ हिंदी में सबसे पहले पढ़ें abp News पर। सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट एबीपी न्यूज़ पर पढ़ें बॉलीवुड, खेल जगत, कोरोना Vaccine से जुड़ी ख़बरें। For more related stories, follow: Business News in Hindi

मध्य प्रदेश: मिर्च के किसानों के निकले आंसू, कीमतें गिरने से घाटे का सौदा साबित हो रही खेती

इस वक्त हरी मिर्च का थोक खरीदी मूल्य 11 से 12 रुपये प्रति किलोग्राम के बीच चल रहा है, जबकि एक किलोग्राम मिर्च उगाने में करीब आठ रुपये की लागत आती है

Edited by: India TV Paisa Desk
Updated on: September 15, 2021 18:23 IST

मध्य प्रदेश: मिर्च के. - India TV Hindi

Photo:PIXABAY

मध्य प्रदेश: मिर्च के किसानों के निकले आंसू, घाटे का सौदा कीमतें गिरने से घाटे का सौदा साबित हो रही खेती

इंदौर। मध्य प्रदेश में मिर्च की खेती किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हो रही है क्योंकि ज्यादा उत्पादन के चलते इस मसाला फसल के थोक दाम इस कदर गिर गए हैं कि उनके लिए इसके उत्पादन और इसे खेत से तुड़वाने की लागत निकालना मुश्किल हो रहा है। राज्य के सबसे बड़े मिर्च उत्पादक निमाड़ अंचल के खरगोन जिले के गजानंद यादव इन किसानों में शामिल हैं जिन्होंने पांच एकड़ में मिर्च बोई है।

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उन्होंने मंगलवार को बताया, "इस वक्त हरी मिर्च का थोक खरीदी मूल्य 11 से 12 रुपये प्रति किलोग्राम के बीच चल रहा है, जबकि हमें एक किलोग्राम मिर्च उगाने में करीब आठ रुपये की लागत आती है और मजदूर इसे खेत से तोड़ने के बदले पांच रुपये किलोग्राम के मान से मेहनताना लेते हैं।" यादव ने बताया कि पिछले साल किसानों को एक किलोग्राम हरी मिर्च के बदले 42 रुपये तक का ऊंचा दाम मिला था और इसे देखते हुए वर्तमान सत्र में इसकी खेती के प्रति उनका आकर्षण बढ़ गया।

उद्यानिकी विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि राज्य में हरी मिर्च का ज्यादा उत्पादन होने से इसके थोक दाम गिर गए हैं, लेकिन आने वाले दिनों में जब यह सूख कर लाल हो जाएगी तो किसानों को इसका बेहतर मोल मिलने की उम्मीद है। पश्चिमी मध्यप्रदेश के निमाड़ अंचल की गिनती देश के प्रमुख मिर्च उत्पादक क्षेत्रों में होती है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सूबे में फिलहाल सालाना मिर्च उत्पादन करीब 2.18 लाख टन के स्तर पर है। इसमें निमाड़ अंचल के पांच जिलों-खरगोन, धार, खंडवा, बड़वानी और अलीराजपुर का 54,451 टन मिर्च उत्पादन शामिल है। यानी सूबे के कुल मिर्च उत्पादन में अकेले निमाड़ अंचल की भागीदारी 25 प्रतिशत है।

प्याज की खेती अब घाटे का सौदा, नहीं मिल रहे खरीददार, कैसे होगा किसान की बेटी का ब्याह और कैसे चुकाएंगे महाजन का कर्ज

Sheikhpura: टाल क्षेत्र के कई गांव के किसानों की जीविका प्याज की खेती पर निर्भर है। जिले में एकसारी, डीहकुसुम्भा, घाटकुसुम्भा, बाउघाट, भदौसी, बेलौनी, चांदी, वृंदावन सहित दर्जनों गाँवों में वृहद पैमाने पर प्याज़ की खेती की जाती है। परन्तु इस बार इसकी खेती करने वाले किसानों के लिए यह घाटे का सौदा साबित हो रहा है। एक ओर जहां इसकी खेती को प्रकृति की मार झेलनी पड़ी है। तो वहीं मेहनत से उगाई गयी फसल का खरीददार नहीं मिलने से जिले के प्याज़ उत्पादक किसानों की बेचैनी बढ़ी हुई है।

बारिश ने 50 फीसदी फसल को किया बर्बाद
इस संबंध में किसानों ने बताया कि पिछले वर्ष अक्टूबर महीने तक बारिश होती रही। खेतों में नमी ज्यादा होने की वजह से प्याज़ का बिछड़ा देर से गिरा। फलस्वरूप प्याज़ की रोपाई में भी पन्द्रह दिन से एक महीने तक की देर हो गई। रही-सही कसर फरवरी महीने के पहले सप्ताह हुई जोरदार बारिश ने पूरी कर दी। जिससे किसानों को न सिर्फ प्याज़ में बल्कि अन्य फसलों में भी भारी नुकसान झेलना पड़ा। फरवरी महीने की बारिश में अधिकांश किसानों के खेत पानी में डूब गए। जिससे प्याज पूरी तरह पीले पड़ने लगे थे।

किसानों ने अपनी गाढ़ी कमाई प्याज़ की फसल बचाने में गंवा दी। बारिश की मार का सीधा असर प्याज़ की फसलों पर अब साफ दिखने लगा है। बहुतेरे किसानों के प्याज़ की फसल में प्याज बन ही नहीं पाए। उनके पौधे ज्यों की त्यों खेतो में ही रह गए। जिले के किसानों की माने तो जिले में लगभग 50 फीसदी किसानों की फसल तैयार ही नहीं हुई। जिससे उनकी पूरी पूंजी खेतों में ही धरी रह गयी।

बारिश के कारण बर्बाद फसल

खेत में फसल तैयार पर नहीं मिल रहे खरीददार
जिन किसानों की फसल तैयार होकर कट गई, उनकी तैयार फसल खेतों में रखी हुई है। कोई व्यापारी प्याज़ की फसल को खरीदने को तैयार नहीं हो रहा है। जिससे खेतों में रखे प्याज़ के खराब होने के डर ने इन किसानों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। जिन किसानों की फसल तैयार होकर पहले कट चुकी थी, उनके प्याज़ बाजारों में बिक चुके हैं। लेकिन पिछले दस दिनों से किसान अपनी प्याज़ की फसल खेतों में रखकर व्यापारियों घाटे का सौदा की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं। लेकिन कोई खरीदार न मिलने से उनकी सारी मेहनत पर पानी फिरता नजर आ रहा है। बहुतों किसानों को प्याज़ बेचकर अपनी बेटियों को ब्याहना है तो किसी को अपने कर्जे चुकाने हैं। अधिकांश किसानों ने ऊंची कीमत पर पट्टे लेकर प्याज़ की खेती की है। अगर प्याज़ की बिक्री समय पर नहीं हुई तो उन्हें फिर से कर्ज लेकर खेतों के पट्टे चुकाने होंगे।

खेतों में पड़ा है प्याज

सस्ते प्याज़ की आवक बढ़ने से बढ़ी परेशानी
बीते 15 दिनों पहले प्याज़ में थोड़ी तेजी देखी गयी थी और व्यापारी किसानों के घाटे का सौदा खेत तक पहुंचने लगे थे। लेकिन जिले के बाजारों में बंगाल के सस्ते प्याज़ की आवक बढ़ने से स्थानीय व्यापारियों ने किसानों के खेतों से प्याज़ की खरीदारी ही बंद कर दी। प्याज़ के व्यापार से जुड़े शेखपुरा भिठ्ठा पर निवासी अमरेश मेहता ने बताया कि जिले में बड़े पैमाने पर बंगाल से सस्ते दर पर प्याज़ की आवक बढ़ गयी है। जिससे स्थानीय किसानों की प्याज़ की खरीदारी नहीं हो पा रही है। स्थानीय व्यापारी लोकल प्याज़ का स्टॉक जमा कर उनको बिहार, बंगाल, बांग्लादेश सहित अन्य प्रदेशों की मंडियों में भेजते थे। इन व्यापारियों के पास अभी पूरा स्टॉक जमा है। लेकिन बाहर कोई खरीदार न मिलने से यहां का प्याज बाहर नहीं जा पा रहा है। जिसकी वजह से स्थानीय किसानों को परेशानी झेलनी पड़ रही है। जिन व्यापारियों ने अपना स्टॉक खाली रखा है। वैसे व्यापारी अभी भी स्थानीय किसानों के खेतों तक जाकर प्याज की खरीदारी करने में लगे हुए हैं। जब तक जिले में बाहरी प्याज़ की आवक बन्द नहीं होगी, तब तक स्थानीय किसानों के प्याज़ की बिक्री पर स्थिरता बनी रहेगी।

घाटे का सौदा साबित हुआ मक्के का स्टॉक, कारोबारियों को लग सकता है एक अरब का घाटा

पूर्णिया : एशिया फेम की मंडी गुलाबबाग में मक्का कारोबार से जुड़े कारोबारियों की इस बार सांसें थम गयीं हैं. मक्का खरीदार के अभाव में कौड़ी घाटे का सौदा के भाव में कारोबारी मक्का बेचने को मजबूर हैं. ऐसे में कारोबारी कंगाली की स्थिति में पहुंच गये हैं.

एक अनुमान के मुताबिक इस वर्ष मक्का के कारोबार को करीब एक अरब का घटा लगा है. इसमें स्थानीय छोटे बड़े कारोबारियों से लेकर, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, बेंगलुरु, कोलकाता सहित साउथ इंडिया की कई बड़ी फूड प्रोसेसिंग कंपनियां शामिल हैं. जानकार कारोबारियों के मुताबिक इस वर्ष मक्का के सीजन में करीब पांच लाख क्विंटल मक्का का स्टॉक मल्टी नेशनल कंपनियों के गोडाउन में किया गया था. इसके अलावा छोटे छोटे कारोबारियों द्वारा भी करीब एक सौ से अधिक गोडाउन में मक्का स्टॉक किया गया था, लेकिन मक्का के बाहरी बाजारों में और मंडी में खरीदार

कृषि मंडी गुलाबबाग में मक्का का कारोबार बिहार के मक्का उपज के आधे से अधिक मक्का के आमदनी और बिक्री से जुड़ा है. कोसी क्षेत्र के अलावा यहां मिथिला के इलाके से भी मक्का आता है, मक्के का बड़ा मंडी होने की वजह से गुलाबबाग मंडी में करीब दो दर्जन मल्टीनेशनल कंपनियों का सेक्टर भी खुला और गोडाउन भी बना है. इस मंडी से देश के कई राज्यों के अलावा बांग्लादेश में भी मक्के का कारोबार फैला, यही वजह रही कि यह मक्का स्टॉक करने का प्रचलन लगातार बढ़ता गया और गोडाउन के साथ बड़ी कंपनियों के आने का रास्ता भी बना.

गुलाबबाग मंडी में मक्का के कारोबार से जुड़े कारोबारियों के मुताबिक प्रति वर्ष मक्का उत्पादन के सीजन में तकरीबन 13 से 14 सौ टन मक्का मंडी पहुंचता है. वहीं जिले के कई प्रखंडों और आस पास के जिलों से भी मक्का की लोडिंग होती है. मक्का के कारोबार से जुड़ी आईएलडीसी, लुइस, ड्राइफ्यूस कंपनी, कारगिल, एग्रीकल्चर ट्रेडिंग, एनबीएचसी, नेशनल बल्क हंडिंग कॉर्पोरेशन कंपनी सहित दो दर्जन कंपनियों ने मक्का स्टॉक के लिये गुलाबबाग के आस पास अपनी गोडाउन बना रखी है. इन कंपनियों के द्वारा मक्का स्टॉक करने वाली फूड प्रोसेसिंग फैक्ट्रियों और स्टॉक करने वाली फैक्ट्रियों को फाइनेंस की सुविधा भी उपलब्ध करायी जाती है, जिसके आने के बाद से गुलाबबाग में मक्का के स्टॉक का बाजार सुर्खियों में आ गया और एराइवल भी बढ़ा.

कारोबारियों के अनुसार इस वर्ष इन मल्टीनेशनल कंपनियों के गोडाउन में करीब पांच लाख टन मक्का का स्टॉक बाहरी कंपनियों और स्थानीय कुछ स्टॉकिस्ट द्वारा किया गया था. इसके अलावा सैकड़ों ऐसे गोडाउन गुलाबबाग के आस पास हैं जिसमें छोटे-छोटे स्टॉकिस्ट द्वारा स्टॉक किया गया है. बताया जाता है कि सीजन में मक्का 1250 रुपये प्रति क्विंटल खरीदारी की गयी. आज खरीदार के अभाव में 1200 का दाम बाजार में है. उसपर भी घाटे का सौदा बिकवाली नदारद. स्टॉक में पड़े मक्का में मल्टीनेशनल कंपनियों के 75 प्रतिशत फाइनेंस (स्टॉक फंडिंग) के ब्याज, गोडाउन का भाड़ा, प्रोक्यूमेंट चार्ज, सिक्युरिटी चार्ज कुल मिलाकर जोड़ें तो मक्का के जो दाम चाहिये उससे कम बाजार में दाम है. कारोबारी बताते हैं कि जो हालात हैं उसमें मक्का के बाजार को अरबों का झटका लगा है जिसमें बड़े स्टॉक के अलावा छोटे-छोटे स्टॉक भी शामिल हैं.

मक्का के कारोबार को घाटा लगना कारोबारियों और बाहरी कंपनियों को हताश कर रहा है. इसका असर किसानों के सेहत पर भी पड़ने लगा है. इन दिनों मंडी में मक्का लेकर आये किसानों को खरीदार नहीं मिल रहे हैं, न ही उचित दाम. दरअसल स्टॉक को लेकर बड़ी कंपनियां खुद फंसी है और छोटे कारोबारियों की सांस हलक में अटकी पड़ी है. बहरहाल मक्का के इस हालात पर अब एक बार चर्चा शुरू हो गयी है कि अगर मक्का को लेकर फूड प्रोसेसिंग प्लांट जिले या कोसी के इलाके में लगी होती, तो आज अरबों का घाटा और मक्का उत्पादक किसानों की स्थिति इतनी बदतर नहीं होती.

एक तरफ मक्का की खेती कोसी और पूर्णिया जिले में रफ्तार पकड़ चुकी है, रिकाॅर्ड तोड़ उत्पादन और दो दर्जन कंपनियों का मंडी की ओर रुख करना, ऊपर से मल्टी नेशनल कंपनियों द्वारा गोडाउन स्टॉक फंडिंग की सुविधा का लाभ. ऐसे में फूड प्रोसेसिंग प्लांट लगता है तो मक्का उत्पादक किसानों और कारोबार को मुकाम मिल सकता है. हालांकि इस दिशा में कोशिशें हुई हैं, लेकिन कामयाबी नहीं मिली. करीब पांच वर्ष पूर्व तत्कालीन सांसद उदय कुमार सिंह ने बियाडा में मक्का से संबंधित फूड प्रोसेसिंग प्लांट को लेकर कोशिश की थी, वहीं वर्तमान सांसद संतोष कुशवाहा और धमदाहा विधायक लेसी सिंह ने भी इस दिशा में प्रयास किया था. इतना ही नहीं अररिया में करीब चार वर्ष पूर्व मक्का से स्टार्च बनने वाली फैक्ट्री लगाने का प्रयास हुआ था. वहां स्थानीय लोगो के विरोध के बाद फैक्ट्री निर्माण काम ठप पड़ गया. जानकार बताते है कि उक्त कंपनी ने अपनी जमीन पर निर्माण कार्य अधूरा छोड़ अपना प्लान वापस कर लिया.

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