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दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा डॉलर

दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा डॉलर
सीतारमण ने बातचीत में यह भी कहा, ‘‘भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद अच्छी है, व्यापक आर्थिक बुनियाद भी अच्छी दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा डॉलर है. विदेशी मुद्रा भंडार अच्छा है. मैं बार-बार कह रही हूं कि मुद्रास्फीति भी इस स्तर पर है जहां उससे निपटना संभव है." उन्होंने कहा कि वह चाहती हैं कि मुद्रास्फीति 6 प्रतिशत से नीचे आ जाए, इसके लिए सरकार भी प्रयास कर रही है. बाकी की दुनिया की तुलना में अपनी स्थिति को लेकर हमें सजग रहना होगा. वित्त मंत्री वित्तीय घाटे को लेकर पूरी तरह से सतर्क हैं.

डॉलर मजबूत हो या रुपया कमजोर, महंगाई बढ़ना तो दोनों ही सूरतों में तय है; जानिए कैसे

दूसरी करेंसी की तुलना में डॉलर के मुकाबले रुपया कहीं ज्यादा मजबूत- वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) ने शनिवार को कहा कि दुनिया की दूसरी करेंसी (Currency) की तुलना में रुपया (Rupee) अमेरिकी डॉलर (US Dollar) के मुकाबले कहीं ज्यादा मजबूती से खड़ा रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत के रिकॉर्ड स्तर पर गिर जाने के बाद भारतीय मुद्रा की स्थिति को लेकर लगातार चिंता जताई जा रही हैं।

रुपए की स्थिति पर वित्त मंत्री सीतारमण ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और वित्त मंत्रालय रुपए की स्थिति पर लगातार करीबी नजर रखे हुए हैं।

सीतारमण ने मीडिया के साथ बातचीत में कहा, "अगर मुद्राओं के उतार-चढ़ाव की मौजूदा स्थिति में किसी एक मुद्रा ने अपनी स्थिति को काफी हद तक बनाए रखा है, तो यह भारतीय रुपया ही है। हमने काफी अच्छी तरह इस स्थिति का सामना किया है।"

रुपया गिरने से कैसे होता है नुकसान

डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य में कमी की वजह से देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर यह होता है कि इंपोर्ट बिल बढ़ जाते हैं. जब रुपये में कमजोरी आती है तो हर वह चीज जो आयात की जाती है मसलन- पेट्रोलियम पदार्थ, उर्वरक, खाद्य तेल, कोयला, सोना, रसायन, . वगैरह की कीमतों में इजाफा होता है. हम जो भी सामान विदेश से मंगवाते हैं, उसकी कीमत डॉलर में होती है. ऐसे में हमें उस डॉलर मूल्य के बराबर रुपये में पेमेंट करना होता है. डॉलर का मूल्य रुपये के मुकाबले जितना ज्यादा चढ़ेगा, देश से उतनी ही ज्यादा करेंसी आयात के लिए बाहर जाएगी. नतीजा विदेशी मुद्रा भंडार कम होने लगता है. ऐसे में देश में सामान मंगाना महंगा होता जाएगा और उसकी भरपाई के लिए उस सामान का दाम भारत के अंदर बढ़ाना पड़ेगा. RBI की कैलकुलेशन के मुताबिक, रुपये में हर 5% की गिरावट महंगाई में 0.10% से 0.15% की बढ़ोतरी करती है,.

विदेशी कर्ज पर ब्याज का बढ़ जाता है बोझ

रुपये में गिरावट का एक और बड़ा नुकसान यह होता है कि इससे विदेशी मुद्रा में लिए गए सारे कर्ज और उन पर दिए जाने वाले ब्याज में अचानक बढ़ोतरी हो जाती है. इनमें सरकार द्वारा लिए गए विदेशी लोन के अलावा सरकारी और प्राइवेट बैंकों और कंपनियों द्वारा लिए गए फॉरेन करेंसी लोन भी शामिल हैं. इसके अलावा विदेश में पढ़ाई करना भी महंगा हो जाता है.

रुपये में लगातार गिरावट से शेयर बाजार में भी उथल-पुथल मचती है. विदेशी निवेशकों का भरोसा घटता है और वह डॉलर की मजबूती को देखकर भारतीय शेयर बाजारों से पैसे निकालने लगते हैं. नतीजा शेयर बाजार नीचे आ जाते हैं. विदेशी निवेशकों के इस कदम से रुपये में कमजोरी और बढ़ने का खतरा रहता है.

रुपये को संभालने के चलते घट रहा विदेशी मुद्रा भंडार

हाल ही में ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि अमेरिकी मुद्रा डॉलर, यूरो और येन जैसी अन्य आरक्षित मुद्राओं के मुकाबले दो दशक के उच्च स्तर पर पहुंच गई है. इसने इन मुद्राओं की होल्डिंग की डॉलर वैल्यू को कम कर दिया. इसकी वजह से दुनिया भर में विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign-Currency Reserves) में काफी तेजी से गिरावट आ रही है. भारत से लेकर चेक ​गणराज्य दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा डॉलर तक, कई देशों के केंद्रीय बैंकों ने अपनी-अपनी मुद्रा को समर्थन देने के लिए हस्तक्षेप किया है. भारत की बात करें तो भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 7 अक्टूबर 2022 तक 532.87 अरब डॉलर था, जो एक साल दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा डॉलर पहले के 642.45 अरब डॉलर से कहीं कम है.

रुपये में कमजोरी को आम तौर पर एक्सपोर्ट/निर्यात करने वालों दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा डॉलर के लिए अच्छी खबर माना जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि रुपये में गिरावट होने पर विदेशी बाजार में भारतीय वस्तुओं और सेवाओं की कीमत कम हो जाती है, जिससे उनकी मांग बढ़ने की उम्मीद रहती है. साथ ही डॉलर में मिलने वाले पेमेंट को रुपये में एक्सचेंज करने पर मिलने वाली रकम बढ़ जाती है. हालांकि ध्यान रहे कि दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा डॉलर अगर निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में आयातित कच्चे माल का इस्तेमाल हुआ है या जिन देशों को निर्यात किया जा रहा है, उन देशों की मुद्रा भारतीय रुपये के मुकाबले कमजोर हुई है तो रुपये में गिरावट का फायदा निर्यात में भी नहीं होता है. लेकिन ऐसे उत्पाद जिनमें आयातित कच्चे माल का इस्तेमाल न हुआ हो या और हम ऐसे किसी देश को आयात कर रहे हों जहां की मुद्रा में कमजोरी भारतीय मुद्रा की तुलना में कम हो, तो रुपये में कमजोरी का फायदा एक्सपोर्ट के मामले में होता है.

चार साल की सबसे बड़ी उछाल, 1 दिन में रुपया 100 पैसे मजबूत

डॉलर के मुकाबले रुपये में शुक्रवार को बढ़ोतरी हुई और देसी मुद्रा ने चार साल की सबसे बड़ी एकदिवसीय उछाल दर्ज की क्योंकि अमेरिका में उम्मीद से कमजोर महंगाई के आंकड़े ने संभावना बढ़ा दी है कि फेडरल रिजर्व नीतिगत सख्ती में धीमी रफ्तार अपनाएगा।

शुक्रवार को रुपया 80.81 पर बंद हुआ, जो एक दिन पहले के मुकाबले 100 पैसे मजबूत है। शुक्रवार को रुपये में 18 दिसंबर, 2018 के बाद की सबसे बड़ी एकदिवसीय बढ़ोतरी दर्ज हुई। ब्लूमबर्ग के आंकड़ों से यह जानकारी मिली। रुपये का शुक्रवार का बंद स्तर 21 दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा डॉलर सितंबर, 2022 के बाद भी सबसे मजबूत स्तर है। साल 2022 में अब तक डॉलर के मुकाबले रुपये में 8 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई है।

गुरुवार को भारत में कारोबार समाप्त होने के बाद जारी आंकड़ों से पता चलता है कि अमेरिका में उपभोक्ता कीमत पर आधारित महंगाई अक्टूबर में नौ महीने के ​ ​​निचले स्तर 7.7 फीसदी रह गई, जो बाजार के 8 फीसदी के अनुमान से कम है।

तकनीकी सारांश

Morning Star1D Three Outside Up1W Engulfing Bullish1W Three Black Crows1D Abandoned Baby Bullish5H

जोखिम प्रकटीकरण: वित्तीय उपकरण एवं/या क्रिप्टो करेंसी में ट्रेडिंग में आपके निवेश की राशि के कुछ, या सभी को खोने का जोखिम शामिल है, और सभी निवेशकों के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता है। क्रिप्टो करेंसी की कीमत काफी अस्थिर होती है एवं वित्तीय, नियामक या राजनैतिक घटनाओं जैसे बाहरी कारकों से प्रभावित हो सकती है। मार्जिन पर ट्रेडिंग से वित्तीय जोखिम में वृद्धि होती है।
वित्तीय उपकरण या क्रिप्टो करेंसी में ट्रेड करने का निर्णय लेने से पहले आपको वित्तीय बाज़ारों में ट्रेडिंग से जुड़े जोखिमों एवं खर्चों की पूरी जानकारी होनी चाहिए, आपको अपने निवेश लक्ष्यों, अनुभव के स्तर एवं जोखिम के परिमाण पर सावधानी से विचार करना चाहिए, एवं जहां आवश्यकता हो वहाँ पेशेवर सलाह लेनी चाहिए।
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विदेशी कर्ज पर ब्याज का बढ़ जाता है बोझ

रुपये में गिरावट का एक और बड़ा नुकसान यह होता है कि इससे विदेशी मुद्रा में लिए गए सारे कर्ज और उन पर दिए जाने वाले ब्याज में अचानक बढ़ोतरी हो जाती है. इनमें सरकार द्वारा लिए गए विदेशी लोन के अलावा सरकारी और प्राइवेट बैंकों और कंपनियों द्वारा लिए गए फॉरेन करेंसी लोन भी शामिल हैं. इसके अलावा विदेश में पढ़ाई करना भी महंगा हो जाता है.

रुपये में लगातार गिरावट से शेयर बाजार में भी उथल-पुथल मचती है. विदेशी निवेशकों का भरोसा घटता है और वह डॉलर की मजबूती को देखकर भारतीय शेयर बाजारों से पैसे निकालने लगते हैं. नतीजा शेयर बाजार नीचे आ जाते हैं. विदेशी निवेशकों के इस कदम से रुपये में कमजोरी और बढ़ने का खतरा रहता है.

रुपये को संभालने के चलते घट रहा विदेशी मुद्रा भंडार

हाल ही में ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि अमेरिकी मुद्रा डॉलर, यूरो और येन जैसी अन्य आरक्षित मुद्राओं के मुकाबले दो दशक के उच्च स्तर पर पहुंच गई है. इसने इन मुद्राओं की होल्डिंग की डॉलर वैल्यू को कम कर दिया. इसकी वजह से दुनिया भर में विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign-Currency Reserves) में काफी तेजी से गिरावट आ रही है. भारत से लेकर चेक ​गणराज्य तक, कई देशों के केंद्रीय बैंकों ने अपनी-अपनी मुद्रा को समर्थन देने के लिए हस्तक्षेप किया है. भारत की बात करें तो भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 7 अक्टूबर 2022 तक 532.87 अरब डॉलर था, जो एक साल पहले के 642.45 अरब डॉलर से कहीं कम है.

रुपये में कमजोरी को आम तौर पर एक्सपोर्ट/निर्यात करने वालों के लिए अच्छी खबर माना जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि रुपये में गिरावट होने पर विदेशी बाजार में भारतीय वस्तुओं और सेवाओं की कीमत कम हो जाती है, जिससे उनकी मांग बढ़ने की उम्मीद रहती है. साथ ही डॉलर में मिलने वाले पेमेंट को रुपये में एक्सचेंज करने पर मिलने वाली रकम बढ़ जाती है. हालांकि ध्यान रहे कि अगर निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में आयातित कच्चे माल का इस्तेमाल हुआ है या जिन देशों को निर्यात किया जा रहा है, उन देशों की मुद्रा भारतीय रुपये के मुकाबले कमजोर हुई है तो रुपये में गिरावट का फायदा निर्यात में भी नहीं होता है. लेकिन ऐसे उत्पाद जिनमें आयातित कच्चे माल का इस्तेमाल न हुआ हो या और हम ऐसे किसी देश को आयात कर रहे हों जहां की मुद्रा में कमजोरी भारतीय मुद्रा की तुलना में कम हो, तो रुपये में कमजोरी का फायदा एक्सपोर्ट के मामले में होता है.

देश में कहां पहुंच चुकी है महंगाई

खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी के चलते खुदरा मुद्रास्फीति सितंबर 2022 में 5 महीने के उच्चस्तर 7.4 प्रतिशत पर पहुंच गई. खुदरा मुद्रास्फीति लगातार 9वें महीने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के दो से छह प्रतिशत के संतोषजनक स्तर से ऊपर बनी हुई है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित खुदरा महंगाई सितंबर में 7.41 प्रतिशत पर पहुंच गई. यह अगस्त में 7 प्रतिशत और सितंबर, 2021 में 4.35 प्रतिशत थी. खाद्य वस्तुओं की मुद्रास्फीति इस साल सितंबर में बढ़कर 8.60 प्रतिशत हो गई, जो अगस्त में 7.62 प्रतिशत थी.

हालांकि मैन्युफैक्चरिंग प्रॉडक्ट्स दुनिया की सबसे मज़बूत मुद्रा डॉलर की कीमतों में नरमी, खाद्य वस्तुओं और ईंधन के दाम में कमी आने से थोक कीमतों पर आधारित मुद्रास्फीति (WPI or Wholesale Inflation) सितंबर में लगातार चौथे महीने घटकर 10.7 प्रतिशत पर आ गई. थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पर आधारित मुद्रास्फीति इससे पिछले महीने, अगस्त में 12.41 प्रतिशत थी. यह पिछले साल सितंबर में 11.80 प्रतिशत थी. WPI इस वर्ष मई में 15.88% के रिकॉर्ड ऊंचे स्तर पर पहुंच गई थी. WPI मुद्रास्फीति में लगातार चौथे महीने गिरावट का रुख देखने को मिला है. सितंबर 2022 में लगातार 18वें महीने, यह दहाई अंकों में रही.

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